इंक़लाब किसका होगा? महिला-पुरुष सबका होगा।

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संस्कृति की रक्षा के ये तथाकथित रक्षक इस यूनिवर्सिटी की लड़कियों के बहाने पूरे देश की आधी आबादी के बारे में अपना दोमुँहा व विषैला मुँह खोलकर पूरी तरह से ज़हर उगलने में कोई कमी नहीं दिखा रहे हैं। भले ही इनकी कही बातों पर ख़ुद इनका ही मज़ाक़ बन रहा हो, लेकिन देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बाँटने वालों द्वारा देश की आधी आबादी के लिए कही गई इन बेहूदा बातों को हमें हास्यास्पद रूप में नहीं बल्कि गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए।

 

साथियो,

जेएनयू में 9 फरवरी को घटी घटना के बाद से पूरे देश में ‘जेएनयू: राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह’ की बहस IMG-20160308-WA0006चल पड़ी है। एक तरफ तो इस घटना के चलते फासीवादी आरएसएस-बीजेपी राष्ट्रवाद व देशभक्ति के आड़ में न सिर्फ जेएनयू जैसी प्रगतिशील यूनिवर्सिटी पर हमला बोल रहे हैं, बल्कि हमारे पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला कर रहे हैं। ये फासीवादी ताकतें FTII, HCU, AMU और JNU जैसे शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता (ऑटोनॉमी) को तोड़ने, ख़त्म करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के ज्ञानदेव आहूजा और जवाहर यादव जैसे कुछ फ़िरकापरस्त लोगों ने मौक़ा देखकर जेएनयू जैसी लोकतांत्रिक यूनिवर्सिटी को बदनाम करने का ठेका ले लिया है।

संस्कृति की रक्षा के ये तथाकथित रक्षक इस यूनिवर्सिटी की लड़कियों के बहाने पूरे देश की आधी आबादी के बारे में अपना दोमुँहा व विषैला मुँह खोलकर पूरी तरह से ज़हर उगलने में कोई कमी नहीं दिखा रहे हैं। भले ही इनकी कही बातों पर ख़ुद इनका ही मज़ाक़ बन रहा हो, लेकिन देशभक्ति का प्रमाण-पत्र बाँटने वालों द्वारा देश की आधी आबादी के लिए कही गई इन बेहूदा बातों को हमें हास्यास्पद रूप में नहीं बल्कि गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि बीजेपी व आरएसएस के दलाल ज्ञानदेव आहूजा को ‘जेएनयू में बीयर की बोतलें, हड्डियों के टुकड़े, IMG-20160308-WA0007बीड़ी व सिगरेट के टुकड़े, यूज किये हुए कंडोम’ इसलिए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से जेएनयू में समाज के वंचित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, स्त्रियाँ और ग़रीब जनता की ठीक-ठाक संख्या दिखाई देने लगी है। एआईएसएफ संघियों के द्वारा की जा रही इन साजिशों और ऐसे तमाम स्त्री-विरोधी बयानों की कड़े-से-कड़े शब्दों में निंदा कर ख़ारिज करता है।

हमें यह भी समझना होगा कि आखिर ऐसा क्यों है कि ज्ञानदेव आहूजा को जेएनयू के अन्दर रातों में लड़कियों का नंगा नाच और जवाहर यादव को नारेबाजी करने वाली लड़कियाँ वेश्याओं से भी गिरी हुई दिखाई देती हैं ? हम सबको पता है कि आरएसएस स्त्रियों की सदस्यता नहीं लेता है अत: स्पष्ट है कि उनके राष्ट्रवाद में स्त्रियों की जगह ही नहीं है। ये बात और है कि उनकी एक अनुषांगिक शाखा ‘दुर्गा वाहिनी’ जरूर है जिसकी सदस्याएं स्त्रियाँ होती हैं। इसके साथ ही ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ को दोहराते हुए राष्ट्र की परिकल्पना खड़ी करने वाले फासीवादी संघ की राष्ट्र भी माँ है। लेकिन  फिर भी यह मनुवादी लोग स्त्रियों को उस माँ की दोयम दर्जे की संतान ही मानते आये हैं, जो पिता-पुत्र-भाई से संरक्षित हैं।

अब इस पर कुछ सवाल उठते हैं कि आखिर संघ की शाखाओं से स्त्रियाँ गायब क्यों? संघ का संचालक स्त्रीरहित (अविवाहित, ब्रह्मचारी) पुरुष ही क्यों बनाया जाता है ? क्या संघ स्त्रियों की यौनिकता से डरता है या फिर संघ ‘नमस्ते सदा वत्सले भारतभूमे’ गाते हुए भी ‘अपौरुषेयता’ में ही विश्वास रखता है ? इसके अलावा संघ और संघ के हिंदू राष्ट्रवाद के पुराधाओं की चिंता में आखिर स्त्री की यौनिकता का इतना खौफ़ क्यों है कि गाहे-बगाहे अपना ‘कंडोम-चिन्तन’ प्रकट करते रहते हैं। हो-न-हो इसके पीछे संघ की कुंठित मानसिकता और उसकी ट्रेनिंग का परिणाम ही रंग दिखा रहा है जिसमें स्त्रियों, दलितों, वंचितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं होती, और होती भी है तो दोयम दर्जे की। संघ की ऐसी मानसिकता से ये बात साफ हो जाती है कि इनका राष्ट्रवाद ऊँची जातियों के पुरुषों के हितों के लिए साकार होता है। संघ के इस हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्रवाद के विचार में न सिर्फ स्त्री की यौनिकता का डर निहित है बल्कि स्त्री की यौनिकता पर कठोर नियंत्रण का भाव भी अन्तर्निहित दिखाई देता है। पूरे कैंपस को पता है कि इन जनेऊधारी विषधरों के मुँह से जेएनयू के बारे में उगला गया ज़हर और यहाँ की लड़कियों के बारे में गाली स्वरुप प्रयोग किये जा रहे शब्द भले ही किसी और पर प्रभाव न ड़ालें, लेकिन पिछड़े, दलित, वंचित, अल्पसंख्यक, ग़रीब और आदिवासी तबके से आने वाली लड़कियों को इस सब के दुष्प्रभाव का सामना करना पड़ेगा। उनकी अस्मिता पर टिप्पणियाँ की जाएँगी, उनकी पढ़ाई रोक दी जायेगी, उनके माता-पिता उनको विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं दिलायेंगे। इसके अलावा इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि कितनी मुश्किल से स्त्रियों का साक्षरता दर बढ़ा है, लेकिन अब भी उच्च शिक्षा तक बहुत कम लड़कियाँ पहुँच पाती है तथा उनका उच्च शिक्षा तक ड्रापआउट रेट भी काफी ज्यादा दिखाई देता है। ऐसी परिस्थिति में इस तरह के बयान और माहौल उनके लिए और भी कठिन स्थितियाँ पैदा कर देंगे, क्योंकि स्त्रियों की शिक्षा के लिए पहले से ही असहमत इस भारतीय समाज के भीतर एक भयबोध पैदा किया जा रहा है। ऐसे भद्दे और भौंडे बयान देकर उनके लिए घर के दरवाजे और मज़बूत किये जा रहे हैं।

साथियो, समय रहते अगर मनुवादी आरएसएस की ऐसी सतही बयानबाज़ी को नहीं रोका गया तो जल्द ही स्त्रियों को चारदीवारी के अंदर कैद कर दिया जायेगा, जिसके चलते वह खुद को गुलाम महसूस करेंगी…। आधी आबादी को गुलाम बनाये रखना आरएसएस का मुख्य एजेंड़ा भी है जिसे बीजेपी लागू करने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत कर रही है। हमारा मत है कि अब वक़्त आ गया है कि इस देश की आधी आबादी व सारी युनिवर्सिटी की लड़कियाँ एक होकर इसके ख़िलाफ़ बाहर सड़कों पर आकर आवाज उठायें और सत्ता पर काबिज इन मनुवादियों को चुनौती दें। उनसे पूँछें की क्या मेरी कोई अपनी पहचान नहीं है?? क्या मेरा अपना अलग अस्तित्व नहीं है ? क्या मैं तुम्हारी भारत माता के विचार के अंदर नहीं आती ??? अगर हाँ, तो मुझे बिल्कुल भी मंजूर नहीं है ये तुम्हारा भारत माता का कांसेप्टइसे तुम्हें बदलना ही पड़ेगा एआईएसएफ आप सभी प्रगतिशील और बराबरीपसंद लोगों से अपील करता है कि ये सवाल पुरज़ोर ढ़ंग से बुलंद आवाज़ में उठाएँ. आपकी ऐसी तमाम चुनौतियों एवं लड़ाईयों के साथ एआईएसएफ हमेशा आपके खड़ा हुआ है और खड़ा रहेगा।

!! Save Constitution                               Save Democracy                                  Save Universities!!  

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